Tuesday, October 7, 2008

जिंदगी की तलाश मैं !!


बिगडा हूँ बना दे तूं
जो सपना हूँ बुला दे तूं
जो चेश्मय नज़र आऊं आन्खूं से हटा दे तूं
गर यार सेहर आए ख्वाबून से मिटा दे तूं
बे रंग सी दुन्या है न रंगूं को सज़ा दे तूं

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जीवन तुम बिन कैसे बीता किस को सुनाय किस को बतायं
नूर महल मे गन्गूर अन्देहरा किस को सुनाय किस को बतयां
उमर की ढलती शाम मैं हम ने हर कूने मैं चीराग जलाऐ
के जन्मूं का भटका मुस्फीर जो भूले से जे शहर को आए
पूछ जिगर के हाल न हम से हर कूने मैं ज़ख्म हैं खाय
बीत गये न जाने कितने मोसम पर अपना झारा थम थम जाए

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नहीं करार मेरे दिल को एक मुदत से
न जाने कोअन सी मंजिल की तलाश है मुज को
हवा चले है तू कानू मैं कुछ gungunay है
न जाने कूँ सी आवाज़ की तलाश है मुज कों
भरे शहर मैं मुस्फीर सा यार फिरता हूँ
नज़र नहीं जो आए उस शक्स की तलाश है मुज को
गुलूं के शहर मैं कांटे बी हैं चुबन बी है





1 comment:

  1. you have not added any new poem for long time.

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